14 August, 2015

माइक्रोसॉफ्ट की जमी-जमाई नौकरी छोड़कर कैब कंपनी OLA स्थापित की।

यह कहानी एक ऐसे आईआईटी पासआउट की है जिसने माइक्रोसॉफ्ट की जमी-जमाई नौकरी छोड़कर कैब कंपनी OLA स्थापित की। दिलचस्प यह भी है कि जिसकी कैब से 70 शहरों में लोग सफर करते हैं, उसने खुद के लिए कार नहीं खरीदा है।
तस्वीरों का प्रयोग प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।


आईआईटी मुंबई के कम्प्यूटर साइंस व इंजीनियरिंग ग्रैजुएट (बीटेक) भाविश अग्रवाल ने 2010-11 में ओला कैब्स की स्थापना की तो परिवार और दोस्तों ने उन्हें ‘क्रेजी’ कहा। माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च
 की नौकरी करते हुए भाविश ने अब तक दो पेटेंट्स प्राप्त किए थे। उनके तीन पेपर्स इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित हुए थे, पर ग्लोबल बिजनेस एग्जीक्यूटिव बनने के बजाय वे सेल्फ मेड एंटरप्रेन्योर बनना चाहते थे। माइक्रोसॉफ्ट में सुरक्षित भविष्य भी 9 से 5 की जॉब, भाविश की उकताहट को कम नहीं कर पाया। भाविश कहते हैं, मैं हमेशा से ही खुद का कुछ शुरू करना चाहता था और यही वजह थी कि मैं विकल्प तलाश रहा था। लेकिन साथ ही मैं सोसायटी की किसी समस्या का समाधान प्रस्तुत करने के बारे में भी सोचा करता था।

इस सोच के साथ भाविश अपने वेंचर ओला कैब्स तक कैसे पहुंचे, इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, एक ट्रिप के खराब अनुभव से इसकी शुरुआत हुई। दरअसल एक बार बेंगलुरु से बांदीपुर की यात्रा में भाविश ने कार किराए पर बुक की थी, जिसका अनुभव बेहद खराब रहा। बीच रास्ते में ड्राइवर ने गाड़ी रोककर और पैसा देने की मांग की। मना करने पर उसने सफर वहीं रोकने की धमकी दी। उसके खराब बर्ताव की वजह से भाविश को कार छोड़कर बाकी की यात्रा बस से करनी पड़ी। इस वक्त भाविश को लगा कि इस समस्या का सामना बड़ी संख्या में उनके जैसे कई कस्टमर्स कर रहे हैं जो क्वालिटी कैब सर्विस की तलाश में हैं, लेकिन उनकी यह तलाश सफर के बुरे अनुभवों के साथ खत्म होती है। यहां भाविश को पहली बार कैब बुकिंग सर्विस में क्षमताएं नजर आईं।

अपने टेक्नोलॉजी बैकग्राउंड के चलते भाविश ने कैब सर्विसेज और टेक्नोलॉजी को एक साथ जोड़ने के बारे में सोचा। ताकि कस्टमर्स को ऑनलाइन कार रेंटल बुकिंग्स, रिव्यू व रेटिंग के जरिए बेहतर क्वालिटी आश्वासन और कार व ड्राइवर के बारे में पूरी सूचना मिल पाए। अगस्त 2010 में भाविश ने ओला कैब्स की शुरुआत के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी और इस दिशा में काम शुरू किया। दिलचस्प है कि भाविश जैसी सोच रखने वाले उनके मित्र अंकित भाटी नवंबर 2010 में उनके भागीदार बने। अंकित ने भी आईआईटी से एमटेक और सीएडी (ऑटोमेशन) की डिग्री प्राप्त की थी। भाविश बताते हैं, जब मैंने शुरुआत की तो मेरे माता-पिता सोच रहे थे कि मैं ट्रैवल एजेंट बनने जा रहा हूं। उन्हें समझा पाना काफी मुश्किल था, लेकिन जब ओला कैब्स को पहली फंडिंग हासिल हुई तो उन्हें मेरे स्टार्टअप पर कुछ भरोसा हुआ।

अपने आइडिया के प्रति समर्पण भाविश की इस सोच में झलकता है कि अपनी पत्नी के साथ उन्होंने पर्सनल व्हीकल न खरीदने का प्रण किया है ताकि वे आने जाने के लिए ओला का इस्तेमाल कर सकें। दृढ़ता के इसी स्तर ने भाविश को इस मुकाम तक पहुंचाया है। नए उद्यमियों के लिए भाविश की सलाह है कि सपने तो सब देखते हैं, पर कुछ ही लोग जोखिम उठाते हैं। जब जोखिम उठाएंगे तो कई लोग कई सलाह देंगे। सपने उनके पूरे होते हैं, जो सुनते सबकी हैं, पर करते मन की हैं।

ओला कैब्स का मकसद परेशानी मुक्त, विश्वसनीय और टेक्नोलॉजी युक्त कार रेंटल सर्विस भारतीय उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवाना था। खुद की कारें खरीदने व उन्हें किराए पर देने के बजाया ओला कैब्स ने बड़ी संख्या में टैक्सी ड्राइवर्स के साथ पार्टनरशिप की और पूरे सेट अप में आधुनिक टेक्नोलॉजी को शामिल किया, जहां लोग शॉर्ट नोटिस पर कॉल सेंटर्स और एप्स के जरिए कार बुक कर सकते थे। इन बुकिंग्स में हाफ/फुल डे रेंटल और आउट स्टेशन टैक्सी शामिल थी। ओला कैब्स की स्थापना के बाद कई बार आईआईटी इंजीनियरिंग ग्रैजुएट संस्थापकों ने सारे कस्टमर कॉल्स खुद अटेंड किए तो कई बार ड्राइवर बनकर ग्राहकों को एयरपोर्ट छोड़ा। जहां अंकित भाटी ने तकनीकी मोर्चे की जिम्मेदारी ली तो भाविश ने ग्राहकों और बिजनेस एसोसिएट्स को संभाला।

देश के इस असंगठित मार्केट में सहज व आरामदेय ट्रांसपोर्ट सुविधा उपलब्ध करवाना आसान नहीं था। भाविश अग्रवाल व अंकित भाटी ने कार निर्माता, वित्तीय संस्थानों व बीमा कंपनियों से संपर्क किया ताकि कैब ड्राइवरों को सहज शर्तों व कम ब्याज पर कर्ज मिले। अपने नेटवर्क से उन्हीं ड्राइवरों को जोड़ा, जिनका ट्रैक रिकार्ड साफ था। उन्हें कस्टमर सेवा का प्रशिक्षण दिलवाया। ओला के विस्तार के लिए निजी निवेशकों से पूंजी प्राप्त करने के लिए भी भाविश अग्रवाल को मशक्कत करनी पड़ी। लेकिन मेहनत का दामन दोनों हिस्सेदारों ने पकड़े रखा और इस उद्यमी जोड़ी ने तकनीक की मदद से कार रेंटल सेवा को झंझटमुक्त व विश्वसनीय बनाया। 

60 परसेंट मार्केट शेयर के साथ ओला कैब्स (अब ओला) आज देश की सबसे बड़ी व तेजी से ग्रो हो रही कैब व ऑटो बुकिंग कंपनी है। 1 लाख से अधिक वाहनों के साथ देश के 70 शहरों में सक्रिय ओला प्रतिदिन 1.50 लाख लोगों को आय के अनुरूप (10 से 17 रुपए प्रति कि.मी. की दर से) निजी परिवहन सुविधा उपलब्ध करवाती है। मसलन लग्जरी ट्रैवल्स के लिए ओला प्राइम (टोयोटो इन्नोवा), कम्फर्टेबल ट्रैवलिंग के लिए ओला सेडान (टोयोटा इटिओट), इकोनॉमिक ट्रैवलिंग के लिए ओला मिनी (टाटा इंडिका), महिला यात्रियों के लिए महिला ड्राइवर की ओला पिंक और सबसे सस्ती ओला ऑटो।

इतना ही नहीं ओला द्वारा लाॅन्च स्मार्ट मोबाइल एप्लीकेशन कैब बुकिंग के लिए भारत का अग्रणी एप्लीकेशन है। बिजनेस के स्तर पर तीन सालों में कंपनी 1 बिलियन का आंकड़ा पार कर चुकी है और 2015 के अंत तक 100 शहरों में अपनी पहुंच बनाने की योजना बना रही है। इस सिलसिले में भाविश अग्रवाल ने चार बड़े प्राइवेट निवेशकों से 1281 करोड़ रुपए का निवेश जुटाया है तो अंकित भाटी ने अपने नेटवर्क (कैब मालिक/ड्राइवर और ग्राहकों) को इंटरनेट व फोन (लैंड लाइन व मोबाइल) से जोड़कर सबके लिए ‘विन-विन’ हालात पैदा किए हैं।

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